Thursday, 1 January 2015

लेखा जोखा 2014

हिसाब


                                       अमूमन लोग नए काम की शुरुआत नए साल से, नए महीने या किसी खास दिन से करते है. पर आज 31 दिसंबर २०१४ है साल २०१४ का आखिरी दिन और जब मैं इस आर्टिकल को खत्म कर रहा होऊंगा तब मुश्किल से कुछ मिनट या घंटे बचे होंगे साल २०१४ के. और सब सोच रहे होंगे कल क्या सब करना है पर मेरे लिए पुरे साल का हिसाब किताब के लिए एक अच्छा समय अगर आखिरी कुछ मिनटों में कुछ नाटकीय न हो तो, शुरुआत कहाँ से करूँ इसमें मैं हमेशा ही कनफ्युज्ड रहता हूँ. वैसे बातचीत करने का ये सबसे बेहतरीन हिस्सा होता है की आपने शुरुआत कैसी की, अच्छी शुरुआत हमेशा आपको एक एडवांटेज देती है की आप बातचीत को अपने हिसाब से चला सके. लेकिन तुम तो मेरी डायरी हो अब तुमसे क्या छिपाना और क्या बताना, बहुत पहले जब मैं दरभंगा और पटना में था तब मैंने तीन डायरियां लिखी थी ( २००९ से २०११ ) लेकिन पटना से लौटते समय मैं उन सब को गंगा में बहा आया था.
                                            पूरी तरह याद है मुझे ५ फरवरी २०१२ पटना छोरकर घर लौटना था, गाँधी सेतु जाम था. मैं बस से उतर गया और इअरपीस में बज रहे जगजीत की पुरानी गजल को रिपीट कर के सुन रहा था. क्या बेहतरीन गजल और जादूगरी भरी आवाज
                               “ तेरी खुशबू में बसे खत मैं गंगा में बहा आया हूँ,
                                             आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ ”

                                          आवाज ने जादू सा काम किया, मैंने वो डायरियाँ अपने बैग से निकाली और उन्हें गंगा को अर्पित कर दिया. क्या मैं सचमुच ऐसा चाहता था? पता नहीं. खैर जो भी हो कम से कम मैं आज तो नहीं चाहूँगा की कोई उन डायरियों को पढ़े. मेरे हिसाब से डायरी का असली उपयोग आपके मरने के बाद आपका मूल्यांकन करने या लिखने वाले से छिप कर पढ़ने का ही होता है. मुझे लगता है डायरी लिखने वाले अंतर्मुखी व्यक्ति होते है, जो दुनिया को अपने बारे में बताना तो चाहते है पर बातों को डायरी में लिखते है, और मन ही मन यह चाहते है कोई तो इसे पढ़ लो, जैसे मैंने भैया की डायरी चुपके से पढ़ के मधु भाभी के बारे में जाना था ( और सब को बताया भी था ). खैर मैं तो खुले आम चाहूँगा कोई इसे पढ़े.
                                         २०११ के बाद मैंने डायरी लिखनी छोर दी थी, लेकिन इन तीन वर्षों में मेरे जिंदगी में इतने सुनामी आये की क्या बताऊँ, सब मेरी ही गलती थी लेकिन क्या करूँ “ है अपना दिल तो आवारा, और इसी आवारगी ने मारा है.” मैं पुनर्नवा की तरह कई बार इन तीन वर्षों में खत्म हुआ, फिर खुद को खरा किया, फिर से खत्म होने को. जितने अंतरद्वंद मैं बीते दिनों गुजरा हू मुझे लगता है इससे बुरा कुछ मेरी जिंदगी में कुछ हो ही नहीं सकता. शायद मैं अपनी जिंदगी के बदतरीन दौर में जी रहा हूँ. इस साल दुर्गा पूजा के समय मुझे टाईफाईड हो गया था, मामूली बीमारी है लेकिन जब मैं बिस्तर पर पड़ा था और अपने पैरों को भी हिलाने की ताकत नहीं पा रहा था तब मेरे मन में एक ख्याल आया अगर मैं मर गया तो लोग मेरे बारे में जानेंगे कैसे, बहुत सारी गलतफहमियां फैली थी मेरे बारे में . उस समय मेरे मन में आया क्योँ न फिर से डायरी लिखी जाये. वैसे मैंने इस बीच एम् एस वर्ड का इस्तेमाल करके कुछ नोट बनाये थे पर वे सब भी हार्ड डिस्क क्रैश होने से खत्म हो गए. बातें कहाँ से सुरु हुई और कहाँ तक चली गयी लेकिन जो मूल बात थी वो तो अभी शुरू भी नहीं हुई है.
                                   गणित का स्टूडेंट रहने के वाबजूद कभी जिंदगी का मूल्यांकन नहीं किया, लेकिन इस वर्ष का तो जरुर करूँगा. काफी विशेष था यह वर्ष, बहुत कुछ टूटा बहुत कुछ बना, बहुत कुछ खोया और बहुत कुछ पाया भी. शुरुआत तो और सालों की तरह ही हुई धुंध की चादर में लपेटी हुई, कुछ साफ़ सा न दिख रहा था, काश ज्योतिषी सही होती या टाइम मशीन जैसा कुछ होता और सब अपना भविष्य जान लेते. लेकिन जीना तब कितना नीरस होता न. जनवरी और फरवरी तो सामान्य से ही गुजरे बिना कोई हलचल किये बिलकुल तूफ़ान से पहले की शांति की तरह . लेकिन मार्च ने सब कुछ बदल कर रख दिया, छोटू मामू की शादी में पकड़ा ( भागलपुर ) गया था, मेरी वेबकूफी या कुछ और कहूँ समझ नहीं आता ने मेरी इमेज को पूरी तरह से बदल कर रख दिया. अचानक से एक शांत और गंभीर सा लड़का लोगों की नजर में आवारा और बदचलन सिद्ध हो गया. उस समय मैं चीख चीख कर कुछ खास लोगों से कहना चाहता था मेरा भरोसा करो मैं ऐसा नहीं हूँ. पता नहीं उन लोगों के मेरे बारे में क्या विचार है पर उन लोगो के नाम मैं दे रहा हू शायद कभी भूले भटके इसे पढ़े तो मुझे जरुर बताये. मेरे भैया, मामू जी – मामी, मौसी जी,  गोलो मौसी, मुकेश मौसाजी, बबली मौसी, चिम्पू मामू, रौसन और बाबुल. मैंने एक नाम को जान बूझ कर बाहर रखा, बाकि लोगों की राय मेरे लिए कोई खास मायने नहीं रखती क्यूंकि मेरे पिता कभी मुझसे सफाई नहीं मांगते सीधे उनका फैसला होता है और मेरी माँ के सामने मेरी सफाई के लिए कोई जगह नहीं होती, इनके अलावा मुझे नहीं लगता कोई मुझे इतना जनता है की मेरे बारे में अपनी राय कायम कर सके. मेरी उत्तरोतर गलतियों ने मुझे और नीचे गिराया जहाँ मैं खुद से भी नजरे मिलाने से बचता. लेकिन दुनिया से छिपना बहुत ही आसान है पर खुद से बचना कितना मुश्किल होता है. गलतियों पे गलतियाँ करता गया और गलतियों में ही मई और जून भी गुजरे. जिंदगी में पहली बार अंशु सेकेंड डिविजन से पास हुआ. खुद से तो परेसान था ही लोगों ने भी एक के बाद एक परेशानियाँ मेरे रास्ते में बिछानी जारी रखी. युनिवर्सिटी वालो ने रिसल्ट में अब्सेंट कर दिया. कंप्यूटर का हार्ड डिस्क फेल हुआ,उसे बदला तो मदरबोर्ड ने जवाब दे दिया. कोई फेसबुक पर फर्जी आई डी बनाकर परेशान कर रहा था तो कोई अफवाहें फैला कर. नाम तो नहीं लेना चाहता था किसी का पर मेरा सबसे करीबी जिसे मैं सब कुछ बताता था, ने भी वक्त देखा और पीठ ओर कर ऐसी टिप्पणी की मेरे बारे में की मन हुआ काश डैनासोर बचे होते और मुझे खा जाते, कम से कम किसी काम तो आता. खैर जैसे तैसे कम से कम दिन तो कट रहे थे, अचानक लीवर और आंतों में सूजन के साथ टाईफाईड ने धर दबोचा. जिंदगी की अहमियत तब पता चली और जिजीविषा किसे कहते है यह भी. पूरा परिवार चारों तरफ से परेशानियों में घिरा था दुर्गा पूजा के दस दिनों में छोटी को लगातार इंजेक्शन, पापा के दो एक्सीडेंट, गेशु को बुखार, इन सब ने कब मुझे बदल दिया पता ही नहीं चला, एक पूरी तरह नास्तिक, पूजा भी करने लगा.

                                  ये सब तो हुई क्या खोया अब क्या पाया. जितना कुछ खोया उससे कहीं ज्यादा पाया अप्रैल में गेशु ( मेरी छोटी बहन ) के जन्मदिन के दो दिन बाद उसकी शादी ठीक हुई, अचानक से जैसे फिल्मों में होता है. मई में नए घर का काम पूरा हुआ. जून में सीडेक ने मेरे फॉण्ट चेंजर को अपनी वेबसाइट पर जगह दी. अगस्त में नया लैपटॉप लिया. और दिसंबर तो सबसे खास रहा गेशु की शादी हुई, और उसका जीवनसाथी भी उतना ही बेहतरीन. धन्यवाद राजीव जी, मुझे भैया कहने के लिए, लगता है मैं भी बड़ा हो गया हूँ. अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा और भविष्य में कभी नहीं दोहराऊंगा. अपने अंदर फिर से उसी मासूम को पा रहा हूँ जो पांच साल पहले कहीं खो गया था. आज कल फिर से बहुत ज्यादा पढ़ने लगा हूँ. तीन नॉवेल्स पिछले दस दिनों में. नये साल की शुभकामनाएँ तो बहुत मिली है आशा करता हू काम करेंगी, न करे तो भी कोई गम नहीं ऐसे ही जब साल खत्म होने पर मूल्यांकन करूँगा तो हांथो में सिर्फ खुशियाँ और अनुभव ही होंगे, वैसे दोनों ही अच्छे होते है. आज कल एक नए शख्स से बातें कुछ ज्यादा होने लगी है, बहुत अच्छी है वो आज उससे पूछूँगा विल यू बी माय फ्रैंड.